बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
उसे जब आना होगा, वो आएगा
यूँ ही आहें नहीं भरते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
जब बसंत को याद आए, तो सूरज से कहना
हवा फूलों को हँसाए, तुम भी साथ मुस्कुराना
गुनगुनी उम्मीदों वाली धूप को मुट्ठियों में थामना
लंबी यादों वाली रात में यूँ ही ठहर नहीं जाते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
यादें ज़्यादा आएँगी, आँसुओं में बातें होंगी
दिल चाहेगा कि परिंदों के संग दूर उड़ जाएँ
बादलों के पास कहीं कोई सूनी जगह ढूँढ लें
सुनहरी शाम को सुनाना, ख्वाबों की परी का क़िस्सा
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
फागुन का महीना बड़ा छलिया सा होता है
देखना, चाहतों की अंगूठी से नगीना न गिर जाए
इसी मौसम में रूठी जान भी मान जाती है
संभाल कर रखना उसकी निशानी, ज़री का कपड़ा
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
सावन की ऋतु का कोई इलाज नहीं होता
इसी मौसम में मोहब्बतों के मिज़ाज शायराना होते हैं
इसलिए सरताज इश्क़ को अल्फ़ाज़ों में भर देता है
तब पानी जैसे काग़ज़ों पर जज़्बात रखे जाते हैं
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते
उसे जब आना होगा, वो आएगा
यूँ ही आहें नहीं भरते
बुलबुल कह गई थी
मौसमों के पीछे नहीं भागते